पिछले नोट में आपने मेरे यात्रा वाले दिन की कहानी पढ़ी अब ये नोट उसके बाद के वृतान्त के लिए है ....१५ रूपये की रेल यात्रा में मेरे पास टिकेट पहले से है उसके बाद की यात्रा में १५ रुपयों की कहानी है ये
१५ रूपये में रेल की यात्रा
किसी तरह में ट्रेन तक पहुच गया,फिर में अपनी बोगी की तरफ बढ़ा.इस सारी जद्दोजहद में और मौसम के वजह से प्यास लग गई थी...में ट्रेन के बाहर से ही भीड़ को देखा समझ गया की काफी प्रतीक्षा सूची के यात्री है ट्रेन में ,बरहाल में अपनी बोगी की और बढ़ा और अपनी सीट तक जा पहुचा ...फिर एक सरसरी निगाह वह बैठे लोगो पर डाली..वहा कुल ७ लोग बैठे थे |
१ विदेशी पुरुष (आंग कांग सुकी जी के मायके से )खिड़की की सीट पर
१ भारतीय व्यस्क जोड़ा (मंगल पाण्डेय के छावनी से ) क्रमशः भाई साहब और भाभी जी
१ भारी चेहरे और रोबदार आवाज वाले व्यक्ति (महा नदियों के संगम स्थली से )
१ विदेशी महिला(सोनिया जी के मायके से )खिड़की की सीट पर
१ हसमुख और अंतर्मुखी लड़का (मेरे गृहनगर से )क्रमशः
और १ प्रबुधता का चोगा पहने दिग्भ्रमित निजी तकनिकी कालेज की उपज (नवाबो के शहर से ) बेठे हुए थे
मेने सबके चहरे एक बार देखकर उनको समझने की कोशिश की (आप की यात्रा केसी होगी इसका निर्धारण आपकी सहयात्री भी करते है,क्योकि उनके योगदान से ही आपकी यात्रा सुखद या दुखद बनती है)
ये सारे लोग निचे की दोनों सीटो पर बैठे हुए थे,बीच की सीट अभी खुली नहीं थी ( ऊपर की दोनों सीटो पर क्रमश विदेशी महिला और पुरुष बैठे हुए थे )में भी बेठने के लिए बढ़ा पर मेरे तरफ की निचली सीट पर कुछ सामान रखा था...
मैंने उस भविष्य के इंजिनीअर से कहा -ये सामान आपका है ?में यहाँ बेठुंगा
भविष्य के इंजिनीअर -(बड़े तेज़ी के साथ) क्या ये सीट आपकी है ?
में -जी नहीं पर बीच वाली सीट मेरी है |
भविष्य के इंजिनीअर -ओह्ह
ये कहकर वो सीट से उठकर खड़ा हो गया | तब मुझे इस बात का एहसास हुआ की इंजिनीअर साहब की टिकेट कन्फर्म नहीं है,और वो खाली सीट देख कर वहा बेठ गए थे
मैंने फिर सीट पर रखे सामान के लिए पूछा -ये सामान किसका है ?
सामने की सीट पर बैठे हुए जोड़े के पुरुषार्थ ने कहा -ये हमारा है ! अभी हटाते है
ये कहते हुए उन्होंने उस बैग को उठा कर सीट के निचे रख दिया
मैंने भविष्य के इंजिनीअर साहब से बैठ जाने को कहा ,उन्होंने भी मेरी बात मान ली
में सीट पर बैठ गया और मुस्कराते हुए अपने बगल में बैठी विदेशी महिला और सामने बैठे विदेशी पुरुष का अभिवादन किया उन दोनों ने भी पुरे जोश के साथ मुस्कराते हुए जवाब दिया
फिर में बाकि लोगो की तरफ मुड़ा उनकी परिचर्चा का केंद्र बिंदु विदशी सेलानी थे
उन सबका मानना था की ये सारे सेलानी हमारे देश की छवि को ख़राब करते है जानबूझ कर यहाँ से गरीबी और गन्दगी की तस्वीरे खिंच कर ले जाते है,और बाद में उन्हें दिखा कर हमारे देश का नाम ख़राब करते है
में भी बहती गंगा में कूद गया मगर में धारा के विपरीत था,
मेने कहा - ऐसा नहीं हैं
रोबीले व्यक्ति ने तपाक से कहा -ये साले एसे ही हैं जानबूझ कर ऐसी तस्वीरे लेते है कभी नालियों की कभी टूटी सडको की.
मेने कहा -आप गन्दा और ख़राब कहे तो ठीक उसी को कोई और गन्दा या ख़राब कहे तो वो गलत ये कौन सी बात हुई,क्या आप परेशान नहीं है ? टूटी सडको और जलजमाव की समस्या से ?क्या आप शिकायत नहीं करते है सिस्टम और नेताओ की ? फिर अगर किसी बाहर वाले ने भी उसी चीज को कहा तो क्यों बुरा लगा ?
मेने उन्हें बनारस में हो रहे सामुदिक नव निर्माणों का और जलजमाव की समस्या का उदाहरण देते हुए समझाने की असफल कोशिश की ,में समझ गया की ये सज्जन उनमे से है जो बिना जटिल और प्रासंगिक तर्कों के अपनी हार नहीं मानते.
मेने थोडा जोर देके कहा - ये हर तरह की तस्वीरे लेते है चाहे ताजमहल हो या लंगूर और आप चाहे तो आप की भी तस्वीरे ले लेंगे
तभी भविष्य के इंजिनीअर साहब बीच बचाव करने के लिहाज से बोले -अरे आप लोग क्यों इतना परेशान हो रहे है कोई बात नहीं
फिर जोड़े में के भाई साब ने (भविष्य के इंजिनीअर साहब से मुखातिब हो ) कहा -अरे घबराओ नहीं ये तो बनारसियो और इलाहाबादियो का सामान्य तरीका है बात का ये झगड़ नहीं रहे है ...
उनके इस बात से मुझे पता चला की रोबीले व्यक्ति इलाहाबाद के निवासी है,और इस बात का भी की भाई साहब को वाराणसी की काफी समझ है|
फिर में उस विदेशी महिला से बातें करने लगा और हमारी बहुत से विषयों पर बातें हुई आध्यात्म,भोजन,पोशाक,भारतीय महिलाओ में असुरक्षा की भावना,कुछ भारतीयों का सेलानियो के प्रति व्यव्हार और भी बहुत सी बातें ....(उन बातों के लिए एक अलग नोट लिखना है मुझे "अतिथि देवो भवः "तो ये सारी बातें वही पर बताऊंगा)
फिर में भाई साहब से बातें करने लगा ...उन्होंने बताया की वो काशी हिन्दू विश्वविद्यालय और काशी विद्यापीठ के छात्र रह चुके है ,उन्होंने काफी समय लंका स्थित महेंद्रवी छात्रावास में बिताया है,भाई साहब राजपूत थे और अपने मुख से अपनी कई कारगुजारियो की व्याख्या भी की बातें पुरे जोर शोर पे थी तभी पानी वाला आया मैंने अपने आखिरी १५ रूपये की और देखा और सोचा चलो कोई बात नहीं अभी पानी पी लेते है बाद की बाद में देखेंगे.
पर ऊपर वले ने कुछ और ही सोच रखा था ------
पानी वाला -भाई लोगो पेसे खुल्ले देना १२ की १ बोतल है
रोबीले व्यक्तित्व वाले -१ बोतल मुझे देना (२० रूपये का नोट बढ़ाते हुए )
पानी वाला - भाई साहब खुल्ले दे दीजिये
व्यस्क जोड़े के पुरुष ने कहा - में पेसे दे देता हूँ सबके ,आप सब बाद में मुझे दे देना
सबने सहमति दिखाई मैंने भी हामी भर दी और अपने पेसे को जेब में वापस रख दिया,कुल ४ बोतल पानी लिया गया
१ बोतल खुला और सबने थोडा थोडा गला तर कर लिया ....
अब में फिर से कुछ देर तक बोल सकता था ,गले में नमी वापस आ गई थी
ट्रेन हर स्टेशन पर थोडा रुकते हुए चल रही थी, ट्रेन एक जगह रुकी जहा बारिश का पानी छिछला सा तालाब जैसा रूप लेकर रुका हुआ था और कुछ बच्चे उसमे सारे सामाजिक वर्जनाओ को ठेंगा दिखाते हुए नहा रहे थे...उन्हें देख कर दोनों सैलानियों ने अपने केमरे निकाले और उन बच्चो की तस्वीरे लेने लगे,उन बच्चो के अलावा उन्होंने खेत खलिहानों और मवेशियों के भी काफी तस्वीरे ली....उनसे बातें करके मुझे ये पता चला था की ये उनका पहली यात्रा है भारत/वाराणसी की.
उनको देख कर रोबीले व्यक्ति ने कहा-ये सब मानेंगे नहीं,इसी तस्वीरे ही लेंगे
मैंने कहा -आप इनको बोल रहे है ,उनको नहीं बोलते जो जिम्मेदार हैं
रोबीले व्यक्ति - कौन जिम्मेदार हैं ?
मैंने कहा -आप और हम जो आपने अधिकारों और सामाजिक सम्पति के लिए नहीं लड़ते...सड़क पर लगे पानी में कपडे बचाते हुए और भ्रष्टाचार की दुहाई देते हुए निकल जायेंगे, जब तक की पानी हमारे घर में घुस कर हमारे निजी सामानों को नुक्सान ना पंहुचा दे
(मेरी आवाज में अब थोडा रोष आ गया था )
इस पर उनका जवाब था - एक आदमी के चाहने से क्या होगा कुछ नहीं बदलने वाला,जब तक सारे लोग इसका विरोध नहीं करेंगे |
बस अब उन्होंने मुझे मौका दे दिया था उनको आड़े हाथ लेने का ...
मेने अपने आप को शांत करते हुए कहा -"उम्मीद करता हूँ आप को गिनती आती होगी,१० तक गिनती सुनायेंगे क्या ?"
रोबदार चेहरे पर कुछ अपमान की लकीरे उभर कर आ गई और कहा -क्यों क्या मतलब है इसका
मैंने कहा -"बुरा मत मानिए कृपया करकर एक बार गिनती सुना दीजिये "
मेरी इस बलवती इच्छा ने वह बैठे सभी लोगो का ध्यान मेरी तरफ कर दिया था ,सारे चुप हो गए थे और हम दोनों के चेहरे को देख रहे थे
रोबीले व्यक्ति ने कहा -चलो मान लो सुना दिया अब आगे क्या ?
मैंने कहा - "नहीं एसे नहीं ,अच्छा चलिए ५ तक ही सुना दीजिये "
उन्होंने बात को ख़तम करने के लिए जल्दी से १-५ तक गिनती गिन दी
मगर मैंने पूर्णविराम को अल्पविराम मैंने बदलते हुए पुनः कहा - "अच्छा एक बार फिर गिनती सुना दीजिये ....कोई बात नहीं ३ तक ही सुना दीजिये "
रोबीले व्यक्ति का चेहरा देखने लायक था, इस गिनती के अनजाने खेल में वो एक अबोध बालक की तरह फस गए थे और उसी बालक की तरह चेहरा भी हो गया था उनका.
उनकी बेबसी को देख कर भाई साहब ने कहा -चलो मयंक मान लो उन्होंने गिनती गिन ली अब आगे
मैंने आवाज को थोडा ऊँचा करते हुए कहा - "आप चाहे कितनी भी गिनती गिन लीजिये शुरुआत १ से ही होती है | चाहे ५ लोग हो या १०० या १००० सबसे पहले हमे अपने से शुरु करना होगा यानि १ से"
अचानक से सारे लोग मेरे तरफ हो गए थे ...मेरा मन नहीं भरा था
मैंने रोबीले व्यक्ति के सेलानियो के प्रति वयवहार का बदला लेने की ठान ली थी .में समझ गया था की मेरे तेज़ बोलिंग ने रोबीले बल्लेबाज़ के मनोबल को कमज़ोर कर दिया .....अब मेने अपनी आखिरी बाल फेंकी ये फिरकी थी और उनके विकेट को प्यार से उड़ाते हुए निकल गई
मैंने कहा - "कोई बात नहीं आप अपनी सोच बताइए यदि १ बहुत ही ज्यादा वृद्ध व्यक्ति जो काफी झुक कर चल रहा है ....आपको उसमे क्या दिखाई देता है ?"
रोबीले व्यक्ति ने कोई जवाब नहीं दिया
मैंने कहा - आप को वो वृद्ध सामान्य वृद्ध ही लगेगा मगर किसी रचनाकार से पूछे तो वो शायद एसा वर्णन करे
"एक वृद्ध व्यक्ति जिसकी पीठ बेटी के विवाह और बेटो को स्थापित करने के दायित्व का बोझ लिए -लिए झुक गई, की अब उसी आकार में आ गई है ,उसके पेट और पीठ एक दुसरे में विलीन हो गए है उसके चेहरे पर पड़ने वाली लकीरें उसके उम्र को बताती है" ये फर्क है नजरिये का
चीज़ एक ही है मगर देखने वाले की नज़र उसे अलगअलग तरीके से देखती है ,उसी तरह ये सैलानी भी कई चीजों की तस्वीरे उनके अनोखेपन की वजह से लेते है और आप को लगता है ये सारी फोटो वो हमारे देश को बुरा दिखने के लिए खींचते है
रोबीले व्यक्ति ने कहा -भाई साहब में हार मानता हूँ ,मेरी गलती थी में आप की बात मानता हूँ की हर एक चीज़ में फर्क सिर्फ नज़रिए का होता है(अब उनके वव्हार में वो रोब नहीं था , उन्होंने पूर्णतया समर्पण कर दिया था ,मेरा भी मन जीत कर काफी खुश था )
तभी खाना बेचने वाला आया -"वेज बिरयानी ले लो "आजकल ट्रेनों में वेज बिरयानी और ब्रेड-कटलेट /ऑमलेट का चलन काफी बढ़ गया है
रोबीले व्यक्ति और मेरे गृहनगर के व्यक्ति ने १ - १ प्लेट ले लिया,रोबीले व्यक्ति ने बड़े प्यार के साथ मुझे भी खाने का निमंत्रण दिया
मैंने भी बड़े प्यार से मिर्च-मसालों की अधिकता का बहाना बनाते हुए उनको ना कह दिया
अब मुझे बहुत जोरो की भूख लग रही थी,पर इतने पैसे तो थे नहीं की कुछ खाता तभी भाई साहब ने कहा -आप हमारे साथ खाना खा लेना, घर का है कम मिर्च और मसाले का
मैंने संकोचवश ना कहा,तब उनकी धर्मपत्नी जी ने कहा -भईया खा लीजिये अच्छा है,और साफ-सफाई से बना है
वो एक कुशल गृहणी थी ये बात उनके वव्हार और भोजन के स्वाद से पता चल गया उन्होंने सभी ९ यात्रियों को खाने के लिए पूछा और मुझे ,मेरे गृहनगर के लड़के और १-२ लोगो को उन्होंने परांठे सब्जी खाने के लिए दिया .....उनके नेह्पूर्ण आमंत्रण /और जोरो की भूख की वज़ह से में मना नहीं कर पाया..मैंने २ परांठे खाए
उन्होंने चावल के लिए कहा मैंने शिष्टतापूर्वक मना कर दिया
भोजन के बाद रोबीले व्यक्ति ने अपने बैग से सोनपापड़ी निकली और सबको खाने के लिए दिया ,सैलानियों को वो मिठाई बहुत पसंद आई ..उन्होंने दुबारा मांग के खाया
मैंने १ टुकड़ा उठाया तो रोबीले व्यक्ति ने कहा - अभी तक आप की नाराज़गी गई नहीं,जिनको लेकर बात हुई वो तो दुबारा खा रहे आप १ पर ही रह गए ....
मेने हँसते हुए और वो टुकड़ा उनकी और बढ़ाते हुए कहा -ये आपके लिए हैं बाकी सारी मिठाई मै खाऊंगा ....मैंने मिठाई का डब्बा उनके हाथ से ले लिया और सबको खिलाते हुए खुद भी छककर खाया,पेट भर गया फिर भाई साहब के द्वारा लिए पानी को पिया
मैंने भाई साहब को पैसे देने की कोशिश की मगर उन्होंने मना कर दिया
मैंने उस विदेशी महिला को अपनी बीच वाली सीट दे दी ताकि निचे वाली सीट पर औरो के साथ बैठ सकू (१ ही रात की तो बात है घर जा कर आराम से सो लूँगा )उन रोबीले व्यक्ति के पाँव में चोट लगी थी मैंने उनको सीट पर सो जाने को कहा वो ४ घंटे के लिए सो गए
कानपूर पर वो प्रबुद्ध लड़का और इलाहाबाद पर वो रोबीले व्यक्ति उतर गए ...उन्होंने ने जाते जाते कहा- आपसे मिलकर काफी अच्छा लगा....मैंने कहा -एसा है तो फिर से जरूर मिलेंगे
सुबह हो गई थी और ट्रेन MANDUADIH स्टेशन पर पहुच गई थी
मुझे यही उतरना था यहाँ से मेरा घर ज्यादा नजदीक था,भाई साहब मुझसे हाथ मिलाने लगे मैंने मना करते हुए भईया भाभी को आदरपूर्वक नमस्ते किया और उनके खाने की १ बार फिर तारीफ करते हुए ट्रेन से उतर गया ....स्टेशन के बाहर से BHU गेट के ऑटो मिलते है में उनमे से १ में बैठ गया ....मैंने पूछा कितना किराया लोगे उसने कहा १५ रूपये सवारी मेने अपनी जेब में पड़े १५ रुपयों को देखा फिर एक बार स्टेशन की और देख कर भगवान को इतने रोचक सफ़र के लिए शुक्रिया कहा और अपने घर की और बढ़ चला