Sunday, September 4, 2011

+++++++ अविस्मर्णीय वाराणसी यात्रा +++++++

प्रकाथ्न्न

१ से १.५ महीने में १ कभी कभी २ चक्कर वाराणसी का लग जाता है.हर एक बार कुछ नया अनुभव होता है ...इस बार की यात्रा में वाराणसी प्रवास ३ (१३-१५ अगस्त ) दिनों का था मगर मुझे ९ (१३-२१ अगस्त) लग गये ...उसका भी कारन था पूरी यात्रा का वृतांत एक नोट में संभव नहीं है.अतः में इसको ३ नोट में वर्णित करूँगा....

. १५ रूपये में ट्रेन की यात्रा

२.अतिथि देवो भवः (विदेशी महिला की राय ...)

३.घर पर इतने दिन रुकने का प्रयोजन और वापसी

ये यात्रा-वृतांत में आप सभी का साथ बाँटना चाहता था (और उस विदेशी महिला की इच्छा भी थी की हम दोनों के बीच हुई बातो को में औरो के साथ share भी करू ) इसी के फलस्वरूप ये पोस्ट आप सब के सम्मुख है....

भारत देश की धार्मिक राजधानी वाराणसी मेरी जन्मस्थली और मेरी मूल स्थान भी है,विगत ५ वर्षो से देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली मेरी कर्मस्थली है,

वाराणसी दिल्ली यात्रा के लिए में रेलमार्ग को प्रयोग में लाता हूँ,उसमे भी श्री लालू प्रसाद जी के कार्यकाल में आई गरीब-रथ मेरी उपयोगिता श्रेणी में प्रथम स्थान पर है परन्तु सबसे बेहतर शिवगंगा एक्सप्रेस ही है......खेर मैं क्यों आप सब को रेलवे का बज़ट सुना रहा हूँ .....अभी मैं रक्षाबंधन के सुअवसर पर अपने गृहनगर वाराणसी जाने को उत्प्रेरित हुआ मगर जब तक अपनी टिकेट बुक करता वाराणसी जाने वाली सभी गाडियों मैं प्रतीक्षा सूची बहुत ज्यादा हो चुकी थी....फिर मैंने दिनांक १०/८/२०११ को ना चाहते हुए भी अपने एक स्टुडेंट (मैं पहले एक प्रशिद्ध कंप्यूटर शिक्षण संस्थान में तकनिकी प्रशिक्षक था )को अपनी तकलीफ बताई और उस सज्जन ने विदेशी कोटे से शिवगंगा एक्सप्रेस की शयनयान (sl) एक टिकेट की व्यवस्था कर दी...S2 coach में 21 नंबर की सीट मुझे मिली

(मैं अपने उस स्टुडेंट का बहुत आभारी हूँ,इस व्यक्ति ने कई त्योहारों पर मेरे घर जाने की इच्छा मैं बाधा बने टिकेट उपलब्धता के संकट से मुझे निजात दिलाई है)

तो आखिर मेरी वाराणसी यात्रा का दिन आ गया मैंने ऑफिस से आज (१२/०८/२०११) की भी छुट्टी ले रखी थी अगले तीन दिन भी छूट्टी थी.में हमेशा यात्रा वाले दिन ही अपना बैग तैयार करता हूँ ,क्या करू आदत से मजबूर हूँ ....(मेरे करीबी इसे मेरा आलस्य कहते है में समय की पाबन्दी खेर, मेरे समय के पाबन्दी की वजह से १ -२ बार ही ट्रेन छूटी है मेरी so dats not big deal ....)आज मेरे घनिष्ट मित्र देवेश पाण्डेय जी (जोकि वाराणसी के रहने वाले है और विगत कुछ दिनों से दिल्ली आये हुए है) के साथ घुमने की योजना भी है तो में और सौरभ(मेरे अभिन्न मित्र)घर से निकले शास्त्री-पार्क मेट्रो स्टेशन पर देवेश जी के साथ -साथ भरी वर्षा ने हमारा स्वागत किया ...जिसके फलस्वरूप १ घंटे तक हमलोग मेट्रो स्टेशन पर ही फसे रह गए.उसके बाद हम लोगो ने निर्णय लिया की लक्ष्मी नगर ही चलते है वो पास भी है और वह कई दुकाने है जहा से हम लोग कपडे भी ले सकते है....तो हमलोग लक्ष्मी नगर पहुच गए,आपनी बाजारी ख़त्म करके(मेरे पास कुल नकद १५ रूपये ही बचे थे और में ATM तलाश रहा था)ऑटो की तलाश में निकले ....कोई ऑटो वाला जाने को तैयार नहीं हुआ(अब मुझे चिंता होने लगी थी ,क्योकि घड़ी में शामके ५.३० बज गए है और मेरी ट्रेन ६.४५ की है और अभी हमे घर जाकर बैग भी लगाना है ) १०-१५ मिनट के ज़द्दोजह्त के बाद एक ऑटो वाला तैयार हुआ.घडी की सुइयां ५.४५ का समय बता रही है...फिर मैंने सौरभ के चचेरे भाई सर्वेश जी को फ़ोन किया और उनसे अनुरोध किया की वो घर से मेरा बैग और उसमे मेरे बताये हुए कपडे और सामान लेकर नजदीकी मेट्रो स्टेशन आ जाये ....उन्होंने भी मित्र धर्म का निर्वाह करते हुए मेरी बात मानी और हमसे पहले ही मेट्रो स्टेशन पहुच गए...हमने(में ,सौरभ और देवेश जी ) उनको बहुत धन्यवाद देते हुए उनसे बैग लिया और जल्दी से मेट्रो स्टेशन की और बढ़ चले ... दोनों लोगो के शरीर में आज के बाजारी की थकान थी या मेरे शरीर में ट्रेन छुटने के भय की ताकत ये तो पता नहीं मगर में उन दोनों लोगो (सौरभ और देवेश जी )से अलग हो गया और में नयी दिल्ली स्टेशन जाने वाली मेट्रो में चढ़ गया वो दोनों लोग अगली मेट्रो में चढ़े,में ये भूल गया था की मेरे पास सिर्फ १५ रूपये ही है।नईदिल्ली पहुच कर देखा तो काफी लम्बी लाइन समय ६.३५ मुझे लगा की अब तो ट्रेन गई ...मगर किसी तरह दूसरी लाइन में लग कर में स्टेशन में गया और ७ नंबर प्लेटफ़ॉर्म पर खड़ी शिवगंगा एक्सप्रेस में पहुच गया समय ६.४५ शेष अगले पोस्ट १५ रूपये में रेल की यात्रा में....

बस इतना ही

मयंक मिश्रा



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