
लगता है ये कल ही की बात है,पर यादों पर पड़ी धूल बताती है की बात महीनो पुरानी है.खैर तारीख का इस वाकये से कुछ लेना-देना नही है....
मैं अपने मित्र के साथ पूर्वी दिल्ली के एक मोहल्ले मैं गया था,ये मोहल्ला भी और मोहल्लो जैसा ही था...इसकी हालत कही से भी इस बात का ईलम नही करती थी के ये देश की राजनैतिक राजधानी का हिस्सा है
वही सिमटी हुई गलियाँ,नलियो के बाँध को तोड़ता गंदला पानी, सीलन की रंगोली से सजी दीवारे,सड़क पर फूलों की तरह सजे धूल और कंकड़,और उनमे खेलते अल्मस्त बचपन वो सब कुछ था वहाँ जो इक पुराने सघन मोहल्ले मैं होता है / था .
हम वहाँ पहुच गये जहाँ हमे जाना था मेरे मित्र उस व्यक्ति विशेष से मिलने अंदर चले गये मेरा अंदर जाने का मन नही था...मैं बाहर ही रुका रह गया और उन बच्चो के खिलवाड़ को देखने लगा जो वहाँ खेल रहे थे ....उनके घर वालों ने अपने तरफ से उन्हे ठंड से बचाने का सारे मुनासिब और मौजूद उपाय लगा दिए थे वो दो बच्चे (लगभग एक ५ साल का दूसरा १० साल) जो मेरे पास खेल रहे थे उन्होने कई सारे कपड़े,टोपी और जूते पहन रखे थे ...उनके बदन के कपड़ों की परत तो एक दूसरे के छेदों को धाप रहे थे पर पैरों की नन्ही नन्ही उंगलिया जूतों से ऐसे झाँक रही थी जैसे कोई बच्चा अपने घर की खिड़की से दुनिया को देखता हो
वो बच्चे सड़क पर पड़े कंकरों से खेल रहे थे
कभी वो उन कंकरो को फुटबाल की तरह पैरों से खेलते कभी बाल की तरह हवा मैं उछलते थे
तभी उनमे से छोटे वाले की बाल(कंकर) नाली मैं गिर गई ...दूसरे बच्चे ने उसे दिलासा दिया और दूसरे कंकर को लेकर आने के लिए कहा वो नन्हा बच्चा एक कंकर के लिए एसे ही परेशान हो रहा था जैसे कोई बेरोज़गार नौकरी ढूंढता हो इस खोज के दौरान उसे एक अनोखी चीज़ हाथ लगी "पेंसिल" उसने उसे बड़े ही गौर से देखा ...उल्टा पलटा फिर उसे ज़मीन पर लुढ़का के देखा ...."नही इसमे वो बात नही " फिर भी उसने दुबारा उसे जाँचा पैरों की ठोकर से पर बात बनी नही ,
उसने वही पड़े एक ईंट के टुकड़े को उठाया और उसने उस पेंसिल को गंदगी के समुंदर का रास्ता दिखा दिया ....
बस इतना ही
मयंक मिश्र
बहुत बढ़िया..... :)
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